शनिवार, 30 जुलाई 2016

पागा कलगी-14/22/मिलन मलरिहा

****बेरा के महत्ब बताथे ढेकी***
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आगे हरेली तिहार, चल ढेकी ल बईठार
कुटबो चाऊर सोहारी बर, बहना झार बहार
दाई चिल्लावय अड़बड़ मोला, ढेकी ल सवार
मुसर के बंधनी लोहा ढिलयागे, ठोकदे ग चिपार
कहाँपाबे अईरसा खुरमी, बिन ढेकी घर-दुवार
ठुकुस ठुकुस बाजे ढेकी, तिरयागे तीजा तिहार ।।
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काकी कुटय भौजी ओईरय, दाई लउहा निकालय
एकता के एके सुरताल म, ढेकी सबला बाँधय
बेरा के महत्ब बताथे ढेकी, एकेसंग सबला रेंगाथे
नई साधय जेन बेरा ल संगी, हाथ ओकरे खँचाथे
जईसे मुसर के मार परे ले, धान चाऊर हो जाथे
जीनगी दुख-आँच सेकाके, मनखे इनसान कहाथे ।।
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तईहा के मनखे सुवस्थ रहय, सुद्ध सादा खावय
अपन हाथ म मही-मथके, घी के लेवना बनावय
धान कुटके चाऊर बनाके अउ जाता दार दरावय
ढेकी-जाता किसानी बुता, दिनभर योग करावय
अनुलोम-विलोम आसन म रोज चाऊर पछिनावय
ठुकुस-ठुकुस उठक-बईठक, प्राणायाम होईजावय।।
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ढेकी कुटई सुवास्थ के संगी, दुन्ना फाइदा पावव
काम बुता संग योग साधके, पसीना घलो बोहावव
आनिबानी के उदिम छोड़, ढेकी के गीत ल गावव
मसीन ले परियारण बिगड़त, धियान इहु ल देवव
आलस के संगी बिमारी हवय, पेट झीन बड़हावव
लुकात हे हमर संसकिरति, ढेकी-जाता ल बचावव ।।
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मिलन मलरिहा
मल्हार बिलासपुर

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

पागा कलगी-14/21/ललित वर्मा,छुरा

बिसय:- चित्र अधारित
धनाक्षरी छन्द
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ढेकी देखव चलथे
चाऊंर बने छरथे
सास-बहु दुनो मिल
पिरीत ल गढथे
ननंद चुप्पे सुनथे
दीवाल ओधे गुनथे
ढेकी के संगीत संग
सीख-नीक बुनथे
ढेकी हूत करावथे
दीदी ल सोरियावथे
अंगना म आव कहि
मीठ गाना गावथे
ननंद ह बतावथे
जम्मो बहिनी आवथे
ढेकी संग नाचौ कहि
झूम-झूम गावथे
ढेकी आज नंदावथे
मेल-जोल गंवावथे
बिकास के कटारी म
चिन्हारी कटावथे
रचना:- ललित वर्मा,छुरा

पागा कलगी-14 /20/आशा देशमुख

विषय ...ढेंकी (चित्र आधारित )
वइसे तो छंद विधा नई आवय पर थोकिन परयास करे हव ,गलती होही त माफ़ी देहु आपमन|
दोहा अउ आल्हा छंद के हिसाब से ये रचना हे
दोहा 13 ,11के मात्रा
आल्हा 16 ,15 के मात्रा ,अंत गुरु लघु |
ढेंकी
दोहा...हमरो छत्तीसगढ़ के ,सरग म होय बखान ,
अनपुरना सँउहत खड़े ,धरे कटोरा धान |
नांगर धरे किसान गा ,हे येकर पहिचान ,
घर घर मा कोठी भरे ,ढेंकी कूटय धान|
आल्हा ....
बड़े बिहनिया ढेंकी बाजय ,मया सुवाद सबो सकलाय |
घूम घूम के जांता नाचय ,मूसर बहना ताल मिलाय |
गड़य रहय जे घर मा ढेंकी ,वो घर के होवय गा मान |
दाई माई हँसी ठिठोली ,दया मया के बसय परान |
जात बिजात न जानय ढेंकी ,बस जानय वो गुत्तुर गोठ |
हाँथ गोड़ के सुनता देखय ,चउर छरावय पोठे पोठ |
कहाँ गवांगे मूसर बहना ,कहाँ गवागे ढेंकी मोर |
मोला अइसन लागय भइया , लेगे हवे समे के चोर |
जब ले गेहे ढेंकी घर ले ,धनकुट्टी के बाजय शोर |
जांगर लेलिस छुट्टी सबके ,रोग बिमारी धरलिस जोर |
ढेंकी के कुरिया हे सुन्ना ,जॉता के फुटगे हे माथ |
घर घर मा अब मिक्सी बइठे ,सिललोढ़हा के टुट्य हाँथ |
चलव सबो जुरियावव भाई ,मिलके परन करव गा आज |
अपन जुन्ना संसकिरती के ,अउ गा लाबो नावा राज |
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आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा (छ .ग )

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

पागा कलगी-14/19/जगदीश "हीरा" साहू

* ढेकी *
आज सब घर ले ढेकी नदागे ।
मिल के पाछु सबझन मोहागे।।
पहिली सब मिलजुल के, धान कुटे जावय ।
अंतस के गोठ, एक दूसर ले गोठियावय ।।
अब तो सब मनखे, एक दूसर ले दुरिहागे।
आज सब घर ले, कइसे ढेकी नदागे ।।
मिलजुल के एक संग, करय सब काम ।
नई लागे जिम जाये बर, तन ला हे अराम ।।
आज माढ़े ढेकी ला, सौहें घुना खागे ।
आज सब घर ले, कइसे ढेकी नदागे ।।
मनटोरा धान कूटय, मंगलीन हा खोवय ।
सुकवारा नोनी हा खड़े-खड़े देखय ।।
मन भारी कुलकत हे, दुःख सब भुलागे ।
आज सब घर ले, कइसे ढेकी नदागे ।।
जगदीश "हीरा" साहू
कड़ार (भाटापारा) ,9009128538

पागा कलगी-14 /18/अशोक साहू , भानसोज

ढेंकी।।
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ढेंकी बाजय ठकरस ठकरस
सुर ताल ह बने सुहावय।
कतको धान ल कूट कूट के
दाईं ह हमर मढावय।।
घर म नईये ढेकी बाहना
त पडोसीन घर जुरियावय।
गोठियावत अपन सुख दुःख ल
लउहा धान कुटावय।।
ढेंकी चांउर के भात म
सुवाद अबड राहय भाई।
तन ह घलो बने राहय
नई आवय रोग अउ राई।।
कहां पाबे अब घर म ढेकी
ढेकी के दिन ह पहागे।
मनखे घला अलाल होगे
बात बात म मशीन ह आगे।।


अशोक साहू , भानसोज
तह. आरंग , जि. रायपुर

रविवार, 24 जुलाई 2016

पागा कलगी-14/17/सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

"ढेकी"
घर मे राहय एक ढेकी,
सियान मन के धनकूट्टी।
कठवा के एकठन डांड़ी,
कठवा के एकठन कांड़ी।
डांड़ी के तरी मूसरी,
पहिरे लोहा के मुंदरी।
डाड़ी ला बोहे थुनिहा,
काबर बोहे हे गुनिहा।
मचाय ढेकी एकधुनिहा,
तभो नई धरही कनिहा।
हांथ म धरके डंगनी ला,
गोड़ चलावव ढेकी मा।
ढेकी मचय हमर काकी,
खोवय धान हमर दाई।
भुकरुस भुक ढेकी बाजे,
ककादाई छुमुक नाचे।
ओदर गे धान फोकला,
का पुछबे तहां गोठला।
भूंसा चंऊर अलगावा,
अउ खिचरी रांधव खावा।
कयिसे पेज मिठाइस हे,
अहिलेश्वर ल लिख बतावा।
रचना:--सुखदेव सिंह अहिलेश्वर
गोरखपुर,कवर्धा

पागा कलगी-14/16/जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

नंदागे ढेंकी
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भुकुर - भुकुर बाजे ढेंकी।
भिड़े राहय सास-बहू अउ बेटी।
उप्पर धरे बर राहय हवन डोर।
तरी म राहय दू ठन छोर।
एक कोती लकर-लकर हाथ चले,
त एक कोती सरलग चले गोड़।
दिखे मेहनत दाई-महतारी के।
जघा राहय कहनी किस्सा चारी के।
सास के बहू संग बन जाय,
भउजी के बने ननन्द संग।
जब संकलाय ढेंकी तीर,
मया बाढ़े संग संग।
कुटे कोदो-कुटकी चांउर-दार,
हरदी-मिर्चा धनिया-मेथी।
भुकुर-भुकुुर बाजे ढेंकी।
भिड़े राहय सास-बहू अउ बेटी।
धान के फोकला ओदर गे,
पड़े ले ढेंकी के मार ।
फुंने निमारे अउ अलहोरे,
सिधोय चांउर दार।
पारा-परोसी घलो आय,
धान कोदो धरके।
सिधोके रॉधे दार-भात,
अउ तीन परोसा झड़के।
मिठाय गईंज रांधे गढ़े ह,
मिन्झरे राहय मेहनत अउ नेकी।
भुकुर - भुकुर बाजे ढेंकी ।
भिड़े राहय सास-बहू अउ बेटी।
फेर अब;न जांता के घर-घर सुनाय,
न ढेंकी के ठक-ठक।
सिध्धो बुता सब ला सुहाय,
मूसर-बाहना ढेंकी लगे फट फट।
नवा जुग के पांव म दबगे ढेंकी।
चूल्हा के आगी म खपगे ढेंकी।
किस्सा कहनी म सजगे ढेंकी।
फोटु बन ऐती-ओती चिपकगे ढेंकी।
पुरखा ल कूट कूट खवईस,
अब धनकुट्टी मारत हे सेखी।
भुकुर-भुकुर बाजे ढेंकी।
भिड़े राहय सास-बहू अउ बेटी।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
9981441795