गुरुवार, 29 सितंबर 2016

पागा कलगी-18//8//दिलीप

बहर--222 112 221
नागर जोत लगा ले धान। 
खातू डार बढ़ा ले धान।
पानी देख मुही दे छेक।
पाके जेन कटा ले धान। 1
बहर--222 212 2
बछरू कस मेछरा झन।
लइका तै ईतरा झन।
परही अब मोर झापड़।
आगू ते मटमटा झन। 2
दिलीप

पागा कलगी-18 //7//गुमान प्रसाद साहू

बहर-212 212 222 222 22
भाग मे जे लिखे हे ओ हमला मिलबे करही।
डोहरू फूल हर एकदिन संगी खिलबे करही।
पेड़ हम जब लगाबो आमा के जी संगवारी।
तब हमनला ग ओकर मीठा फल मिलबे करही।
-122 222 112 222
जभे मिहनत करबे ग तभे फल मिलथे।
कुंआ मेरा जाबे ग तभे जल मिलथे।
हवा कस उड़ जाबे न अकेला रहिबे।
सबो जुरमिल रहिबे ग तभे बल मिलथे।
रचना :- गुमान प्रसाद साहू
ग्राम-समोदा (महानदी)
मो. :- 9977313968
जिला-रायपुर छग

पागा कलगी-18 //6//ज्ञानु मानिकपुरी "दास"

मुक्तक-1
समझ नइ आवत हे काम सरकार के।
हवे ये मात्र के नाम सरकार के।
कभू तो हमरो लेते खबर -शोर जी
करे नइ ऐहर कुछु काम फटकार के।
मुक्तक-2
का भरोसा जिनगी के कब का हो जाही न।
देख तोला मोला ऐको दिन रो वाही न।
झन कभू करबे घमन्ड तैहा जिनगी मा रे
काल ऐको दिन आके सबला ले जाही न।
ज्ञानु मानिकपुरी "दास"
चंदेनी कवर्धा
9993240143

पागा कलगी-18 //5//देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)

मुक्तक -1
करौ दरसन भुईयाँ के भगवान के
इही भरथय कटोरा ला जी धान के
सरी जिनगी पहाहे खेती खार मा
इही चिनहा हरे जी हमर किसान के
मुक्तक - 2
जतन करथय अपनेहा खेती खलिहान के
हमर खाना परसादे ऐकर बलिदान के
हमर दाता दुरिहा हे आजो सुख चैन ले
गजब माया दिखथे,ऐ रचना भगवान के....
रचना
देवेन्द्र कुमार ध्रुव (डी आर)
फुटहा करम बेलर
जिला गरियाबंद (छ ग)

पागा कलगी-18//4//जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

मुक्तक(1)
मापनी-22 22 22 221 22
तन मन करिया हेवे,मांजेल पड़ही।
मन ल मया के पाग म,बांधेल पड़ही।
थूके - थूक म थोरे,चूरहि बरा जी,
महिनत करके हाँड़ी,राँधेल पड़ही।
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मुक्तक(2)
मापनी- 22 22 221 22
अब तो आघू,आयेल लगही।
मिल-जुल तोला,खायेल लगही।
छेल्ला घुमबे त , नई बने जी,
मिलके राज , चलायेल लगही।
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जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795

पागा कलगी-18//3//आचार्य तोषण

"दाई के कहिनी बेटा बर"
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चिमनी ममता के बुताबे झन
दाई के अछरा भुलाबे झन
जोहत हे रसदा अगोरा मा
परदेसी बन बेटा गंवाबे झन
२२२ २२२ १२२ २
भाये बड़ मोला तोर बाला पन
देखत बदरा छावय निराला पन
अघुवन पछुवन किंजरै टुरा सेना
देखाबे तै झन कभु ग हाला पन
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-आचार्य तोषण

पागा कलगी-18//2//जगदीश "हीरा" साहू

बहर- 212221122111221122
तोर आँखी के कजरा मा, अटक गेहे मन मोरे ।
तोर झुल-झुल के रेंगना मा, भटक गेहे मन मोरे।।
मोला कतका तै अउ तरसाबे, अब इहाँ वो सुन रानी,
तोर हाँ के देखत रसता, झटक गेहे मन मोरे ।।
(रेंगना- रें मा अउ मोला -ला मा भार गिराये गेहे )
बहर- 21212221212
तोर मीठ बोली, मोर जान हे।
तोर ये ठिठोली, मोर जान हे।।
तोर छोड़ के जाते बिरान हे,
आज एक होंली, मोर जान हे।।
जगदीश "हीरा" साहू (२७९१६)