पागाकलगी के इतिहास म पहिली बार अतका कम रचना आय हे । रचनाकार मन के आभार जउन ‘आसो के जाड़‘ म अपन कलम चलाइन । कम रचना होय के कारण केवल पहिली स्थान भर दे जात हे । खुशी के बात हे दोहा जइसे प्रचलित छंद के संगे-संग अप्रचलित छंद रूचिरा म घला रचना आय हे । आयोजन विधा मुक्त होय के कारण कोनो विधा ला प्राथमिकता दे के कोनो कारण नई बनय । फेर ये खुशी के बात जरूर हे । शब्द के प्रयोग, गेयता, विषय के समावेश ल ध्यान म रखत ये आयोजन के पागा ला भाई सुखदेव सिंह अहिलेश्वर ‘अँजोर‘ के मुड़ म धरे जात हे -
शनिवार, 18 फ़रवरी 2017
शनिवार, 11 फ़रवरी 2017
पागा कलगी -26//4//विक्रमसिंह "लाला"
सर सर हवा करत हे , जाड अडबड लागत हे ।
दिन भर डोकरी दाई कापे , नइ जिये तईसे लागत हे ।।
दिन भर डोकरी दाई कापे , नइ जिये तईसे लागत हे ।।
लईका मन के नाक ह बोहाये , गोड हाथ ह फाटत हे ।
सुर-सुर सबो करत हे , आगी ल तापत हे ।।
सुर-सुर सबो करत हे , आगी ल तापत हे ।।
ठंडा के मारे संगी नहाये के मन नई लागत हे ।
ये ठंडा म चार ठन कथरी ओढे ल लागत हे ।।
ये ठंडा म चार ठन कथरी ओढे ल लागत हे ।।
दाई ह जुन्ना स्वेटर ल पहिरे बर देवत हे ।
टूरा ह जुन्ना ल नई पहिरव कहिके मुँह ल फुलोत हे ।।
टूरा ह जुन्ना ल नई पहिरव कहिके मुँह ल फुलोत हे ।।
सस्ता पताल के चटनी सब झन खावत हे ।
ये जाड के दिन म संगी कथरी के सुरता आवत हे ।।
ये जाड के दिन म संगी कथरी के सुरता आवत हे ।।
सर सर हवा करते हे , अडबड जाड लागत हे ।
दिन भर डोकरी कापे , नई जिये तईसे लागत हे ।।
दिन भर डोकरी कापे , नई जिये तईसे लागत हे ।।
- विक्रमसिंह "लाला"
मुरता नवागढ बेमेतरा
मुरता नवागढ बेमेतरा
पागा कलगी -26//3//जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
आसो के जाड़
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जाड़ म जमगे, माँस-हाड़।
आसो बिकट बाढ़े हे जाड़।
आंवर-भाँवर मनखे जुरे हे,
गली - खोर म भुर्री बार।
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जाड़ म जमगे, माँस-हाड़।
आसो बिकट बाढ़े हे जाड़।
आंवर-भाँवर मनखे जुरे हे,
गली - खोर म भुर्री बार।
लादे उपर लादत हे,
सेटर कमरा कथरी।
तभो ले कपकपा गे,
हाड़ -मांस- अतड़ी।
सेटर कमरा कथरी।
तभो ले कपकपा गे,
हाड़ -मांस- अतड़ी।
जाड़ म घलो,जिया जरगे।
मुँहूं ले निकले धूंगिया।
तात पानी पियई झलकई,
चाहा तीर लोरे सूँघिया।
मुँहूं ले निकले धूंगिया।
तात पानी पियई झलकई,
चाहा तीर लोरे सूँघिया।
जाड़ जड़े तमाचा; हनियाके।
रतिहा- संझा अउ बिहनिया के।
दाँत किटकिटाय,गोड़-हाथ कापे,
कोन खड़े जाड़ म, तनियाके?
रतिहा- संझा अउ बिहनिया के।
दाँत किटकिटाय,गोड़-हाथ कापे,
कोन खड़े जाड़ म, तनियाके?
बिहना धुँधरा म,
सुरुज अरझ गे।
गुंगवा के रंग म ,
चोरो-खूंट रचगे।
सुरुज अरझ गे।
गुंगवा के रंग म ,
चोरो-खूंट रचगे।
दुरिहा के मनखे,
चिन्हाय नही।
छंइहा जाड़ म ,
सुहाय नही।
चिन्हाय नही।
छंइहा जाड़ म ,
सुहाय नही।
जाड़ ल जीते बर,
मनखे करथे उपाय।
साल चद्दर के तरी म,
लुकाय ऊपर लुकाय।
मनखे करथे उपाय।
साल चद्दर के तरी म,
लुकाय ऊपर लुकाय।
फेर ठिठुर के मर जथे,
कतको आने परानी।
जे न जाड़ म कथरी मांगे,
न घाम म ;मांगे पानी।
कतको आने परानी।
जे न जाड़ म कथरी मांगे,
न घाम म ;मांगे पानी।
जब बनेच जाड़ बढ़थे।
सुरुज थोरिक चढ़ते।
त बइठे-बइठे रऊनिया म,
गजब मया बढ़थे।
सुरुज थोरिक चढ़ते।
त बइठे-बइठे रऊनिया म,
गजब मया बढ़थे।
बाढ़े हे बनेच,
आसो के जाड़।
लेवत हे मजा,
अंगरा-अंगेठा बार।
आसो के जाड़।
लेवत हे मजा,
अंगरा-अंगेठा बार।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795
बालको(कोरबा)
9981441795
पागा कलगी -26//2//सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
विषय:- //आसो के जाड़//
विधा:- रुचिरा छन्द
कइसे के गोठियाँव संगी,
राम कथा इही जाड़ के।
दांत ओंठ कँपवावत दहरा,
भीतर हमागे हाड़ के।
राम कथा इही जाड़ के।
दांत ओंठ कँपवावत दहरा,
भीतर हमागे हाड़ के।
निपटे खातिर ए दहरा ले,
नइहे कोनो जुगाड़ गा।
बुता तियारे करै न कोई,
ढचरा लगावैं ठाड़ गा।
नइहे कोनो जुगाड़ गा।
बुता तियारे करै न कोई,
ढचरा लगावैं ठाड़ गा।
ददा बिचारा मुंधरहा ले,
पैरा भूँसा डारत हे।
नागर बैला फाँद जाड़ ला,
लउठी धर ललकारत हे।
पैरा भूँसा डारत हे।
नागर बैला फाँद जाड़ ला,
लउठी धर ललकारत हे।
नान्हे बिरवा इही जाड़ ला,
जइसे खड़े अगोरत हे।
गहुँ चना संग सब्जी भाजी,
छछलत कंसा फोरत हे।
जइसे खड़े अगोरत हे।
गहुँ चना संग सब्जी भाजी,
छछलत कंसा फोरत हे।
नान्हे नान्हे लइका मन ले,
जैसे दहरा हारत हे।
बाँचे बर बुधियार परानी,
झिटका भूर्री बारत हे।
जैसे दहरा हारत हे।
बाँचे बर बुधियार परानी,
झिटका भूर्री बारत हे।
खुसरे खुसरे कमरा भितरी,
बबा बिचारा झाँकत हे।
चहा ल धरके नाती बहु हा,
करत ठिठोली हाँसत हे।
बबा बिचारा झाँकत हे।
चहा ल धरके नाती बहु हा,
करत ठिठोली हाँसत हे।
टोर उवे बर चक्कर बँधना,
सुरुज ला जोजियावत हें।
बैठे सबझन आँट गली मा,
रमनिया सोरियावत हें।
सुरुज ला जोजियावत हें।
बैठे सबझन आँट गली मा,
रमनिया सोरियावत हें।
रचना:-सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अँजोर"
'शिक्षक'गोरखपुर,कवर्धा
25/01/2017
9685216602
'शिक्षक'गोरखपुर,कवर्धा
25/01/2017
9685216602
पागा कलगी -26//1//ज्ञानु'दास' मानिकपुरी
विषय-आसो के जाड़
विधा-दोहा (गलती ल जरूर बताहू)
विधा-दोहा (गलती ल जरूर बताहू)
1-बहुतेच जनावत हवे,आसो के ये जाड़।
तन मन हर काँपन लगे,संगे संग म हाड़।।
तन मन हर काँपन लगे,संगे संग म हाड़।।
2-हाथ गोड़ ठिठुरन लगे,कट कट करते दाँत।
दिन तो जइसे कट जथे,मुसकुल होथे रात।।
दिन तो जइसे कट जथे,मुसकुल होथे रात।।
3-गजब सुहाथे रवनिया,भुर्री तपइ मिठाय।
पानी हर चट ले करे,नाहे बर डरराय।।
पानी हर चट ले करे,नाहे बर डरराय।।
4-बूढी दाई घर लिपे,बड़े फजर उठ जाय।
बाबू दाई नइ उठे,बबा गजब गुसियाय।।
बाबू दाई नइ उठे,बबा गजब गुसियाय।।
5-लइका मन खेलें कुदे,जाड़ देख भग जाय।
बारी टेड़े कोचिया,तन तरतर हो आय।।
बारी टेड़े कोचिया,तन तरतर हो आय।।
6-हाथ जोड़ बिनती करें,बूढ़ा बबा बिहान।
हे सुरुज अरजी सुनव,दरसन दव भगवान।।
हे सुरुज अरजी सुनव,दरसन दव भगवान।।
7-चले हवा सुर सुर गजब,सबके मन ला भाय।
सरसों फूले देख के,तन मन हा झुम जाय।।
सरसों फूले देख के,तन मन हा झुम जाय।।
8-माटी के महिमा गजब,कहे 'ज्ञानु' कविराय।
तोरे कोरा हन सबो,हर मउसम मन भाय।।
तोरे कोरा हन सबो,हर मउसम मन भाय।।
ज्ञानु'दास' मानिकपुरी
चंदेनी कवर्धा(छ.ग.)
चंदेनी कवर्धा(छ.ग.)
बुधवार, 25 जनवरी 2017
मनखे
मनमोहन छंद
मनखे के हे, एक धरम । मनखे बर सब, करय करम
मनखे के पहिचान बनय । मनखेपन बर, सबो तनय
दूसर के दुख दरद हरय । ओखर मुड़ मा, सुख ल भरय
सुख के रद्दा, अपन गढ़य । भव सागर ला पार करय
मनखे तन हे, बड़ दुरलभ । मनखे मनखे गोठ धरब
करम सार हे, नषवर जग । मनखे, मनखे ला झन ठग
जेन ह जइसन, करम करय । तइसन ओखर, भाग भरय
सुख के बीजा म सुख फरय । दुख के बीजा ह दुख भरय
मनखे तन ला राम धरय । मनखे मन बर, चरित करय
सब रिश्ता के काम करय । दूसर के सब, पीर हरय
मनखे के हे, एक धरम । मनखे बर सब, करय करम
मनखे के पहिचान बनय । मनखेपन बर, सबो तनय
दूसर के दुख दरद हरय । ओखर मुड़ मा, सुख ल भरय
सुख के रद्दा, अपन गढ़य । भव सागर ला पार करय
मनखे तन हे, बड़ दुरलभ । मनखे मनखे गोठ धरब
करम सार हे, नषवर जग । मनखे, मनखे ला झन ठग
जेन ह जइसन, करम करय । तइसन ओखर, भाग भरय
सुख के बीजा म सुख फरय । दुख के बीजा ह दुख भरय
मनखे तन ला राम धरय । मनखे मन बर, चरित करय
सब रिश्ता के काम करय । दूसर के सब, पीर हरय
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मंगलवार, 24 जनवरी 2017
//पागा कलगी 25 के परिणाम//
जनवरी के पहिली पखवाड़ा म ‘छेरछेरा‘ विषय म प्रतियोगिता होइस । जेमा कुल 8 रचना आइस । ये आयोजन के निर्णायक छंदविद अरूण निगमजी रहिन । अरूण निगमजी के अनुसार-‘‘हर प्रतिभागी के रचना ह सुघ्घर हे । नाममात्र सुधार के बाद श्रेष्ठ रचना बन जाही । उनकर सामान्य गलती लय टूटना, गलत तुकान्त, तुकान्तता के अभाव, शब्द के मात्रा बिगाड़ के लिखना हे ।‘‘ प्रतियोगिता म बिना गलती या सबसे कम गलती वाले रचना ल चुने जाथे । ये आधार म ये प्रतियोगिता के परिणाम ये प्रकार हे-
पहिली विजेता- श्रीमती आशा देशमुख
दूसर विजेता- श्री मिलन मलरिहा
दूनों विजेता मंच के तरफ ले अंतस ले बधाई, सबो प्रतिभागी मन के आभार ।
संयोजक
छत्तीसगढ़ी साहित्य मंच
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