शनिवार, 3 सितंबर 2016

पागा कलगी-17//1//देवन ध्रुव

मुक्तक 1
ऐहर जग मा पहली पूजा के अधिकारी हे।
दाई ऐकर गौरी, बाबू हा त्रिपुरारी हे।।
शोभा बरनत हावव मैहर तो गणनायक के।
वाहन ऐकर मूसक,काया हा अतिभारी हे।।
मुक्तक 2
मानय तोला सब झन,भगतन बर हितकारी हे।
ऐ जग के सब मनखे,तोरे बर बलिहारी हे।।
करथस मंगल सब बर,जनमानस तरईया तै।
किरपा के तै सागर,अधरे ले चिनहारी हे।।
-देवन ध्रुव

पागा कलगी 17 के विषय

//पागा कलगी 17 के रूपरेखा//
अवधि-1 सितम्बर 16 से 15 सितम्बर तक
विषय- ‘जय जय श्री गणेशा‘
संचालक- श्री चैतन्य जितेन्द्र तिवारी (पागा कलगी-7 के विजेता)
निर्णायक-परम आदरणीय मुकुन्द कौशल, वरिष्ठ साहित्यकार, गजलकार
नियम-छत्तीसगढ़ी कविता के प्रतियोगिता पागा कलगी 17 के रचना सीधा छत्तीसगढ़ी मंच मा पोष्ट करना हे । जेन रचनाकार छत्तीसगढ़ी मंच के सदस्य नई हे, ओ एडमिन मन के व्यक्तिगत वाटशॅंप म भेज सकत हंे । कानो सार्वजनिक वाटशाॅपध्फेसबुक समूह से रचना नई देना हे । प्रतियोगिता अवधि तक प्रतियोगिता के रचना केवल फेसबुक समूह छत्तीसगढ़ी मंच अउ ब्लाग पागा कलगी भर म होही । यदि रचना अंते तंते पाये जाही त रचना ला प्रतियोगिता से बाहिर कर दे जाही ।
विधा - मुक्तक, प्रत्येक रचनाकार केवल दू मुक्तक एक साथ पोस्ट कर सकत हे, अलग-अलग नही । यने कि एक साथ दू मुक्तक दे गे विषय मा । मुक्तक मापनी (बहर) मा होना चाही । बेबहर, रदिफ काफिया रहित मुक्तक प्रतियोगिता मा शामिल नई करे जा सकय ।
विशेष- मुक्तक आधारित 4 भाग मा लेख प्रकाशित करे गे हे, मुक्तक लिखे के पहिली चारों भाग ला एक बार जरूर पढ लेवंय । नीचे के लिंक ल चपक के मुक्तक के बारे मा पढ़ सकत हंव

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

पागा कलगी-16 //23//तरूण साहू "भाठीगढ़िया"

कुण्डलिया छंद
कइसे भेजव राखि
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भइया हे मोर दुरिहा, दुरिहा हे घर द्वार ।
भरगे नदिया नरवा ह, जांवव कइसे पार।।
जांवव कइसे पार, रद्दा म नदिया कछार ।
भेजव कइसे राखि, परब हे राखि तीहार ।।
कोन ह मइके जाहि, भइया हे भाठिगढ़िया ।।
राखि कोन ले जाहि, दुरिहा हे मोर भइया ।।
राखि ले जाबे पड़की, तै भइया के तीर ।
तै सुना देबे मैना, छुटकि बहिनि के पीर ।।
छुटकि बहिनि के पीर, रोवत हे दिन अउ रात ।
बहिनी के नयना म, सावन भादो बरसात ।।
तरूण अस करलई म, बहिनि बोहावथे आँखि ।
भइया ह कलाई म, बन्धवाही मोर राखि ।।
तरूण साहू "भाठीगढ़िया"
ग्राम भाठीगढ़
तहसील+पोस्ट मैनपुर
जिला गरियाबन्द ( छ ग )
मोबाईल नम्बर ९७५४२३६५२१ ९७५५५७०६४४

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

पागा कलगी-16//22//रामेश्वर शांडिल्य

मोर परेवा
आज राखी के तिहार तै आ जा मोर पास।
दुरिहा रहिके मोर मन ल झन कर उदास।
मै बिना भाई के तोला बलावथव।
राखी बांध के तोला भाई बनावथव।
तोर करा भाई के मया जोड़ देहेव।
गोड़ म राखी बांध के छोड़ देहेव।
जग ल सन्देश दे आ बहनी के
सब के देखभाल करो मिल के
मोर सादा परेवा शांति के ये सन्देश।
बगरा देबे पूरा देश बिदेश।
संकट म होही तोर ये बहनी जटायु कस बचा लेबे।
मोर दुःख पीरा ल पथरा कस पचा लेबे।
दाना पानी धर के अगोरत रहूँ।
खिड़की ले रस्ता निहारत रहूँ।
रामेश्वर शांडिल्य
हरदी बाजार कोरबा

पागा कलगी-16//21//दिलीप वर्मा

मोर सुख दुःख के तें संगवारी, 
अब तोर हाबय सहारा । 
बिच भवर म फसे हाबय, 
तहिं लगा दे किनारा। 
आज पुनीमा सावन के ये, 
भाई जोहत रस्ता। 
मोर राखी म मया भरे हे, 
न मंहगा न सस्ता। 
जारे परेवना उड़ जा तेंहा, 
मोर भाई के देशे। 
राखी संग म लेजा भइया, 
ते मोरे संदेशे। 
कहिबे भइया तोर बहिनी ह, 
हाबय अबड़ अभागिन। 
महल अटारी भेज के मोला, 
दाई ददा ह तियागिन। 
दया मया ल राखबे भइया, 
आबे कभु मोर गांवे। 
राखी मेहा भेजत हाबव, 
बांध लेबे मोर नावे। 
जे रस्ता ले जाबे परेवना, 
उहि रस्ता ले आबे। 
जोहत खिड़की ठाढ़े रइहुं, 
भाई के सन्देसा लाबे।। 
दिलीप वर्मा 
9926170342

पागा कलगी-16//20//पी0पी0 अंचल

बहिनी के पाती ले जा रे परेवना,
भाई ल कही देबे संदेश।
बहिनी के राखी ले जा रे चिरइया,
प्रेम के देइ देबे उपदेश।।
भाई ल कहिबे परेवना,
बहिनी तोरे बने हावय।
संसो फिकर झन करही,
भांची भांचा रेंगत हावय।
कछु के फिकर न कलेश......
परेम के देही देबे उपदेश।।
अबड़ सुरता आथे तोरे,
भेंट होही त कहिबे।
दुःख के कोनो बतिया,
इहाँ के झन कहिबे।
आगू बढ़य बनय नरेश........
प्रेम के देही बे उपदेश।।
राखी मोरो बाँध लिही,
बहिनी बाँधथे समझ के।
मीठा बोली बोलिबे बने
गोथियाबे बात बने मगज के।
कड़ा गोठ म पहुँच थे ठेस.......
परेम के देहि देबे संदेश।।
अपनों खियाल रखही,
संग अपनों परिवार के।
काँटा गोड़ म झन गड़य,
पाँव रखही निमार के।
मोदक चढ़ाही उत्सव गणेश......
परेम के देहि देबे उपदेश।।
रचना:-
पी0पी0 अंचल
हरदी बाज़ार कोरबा

सोमवार, 29 अगस्त 2016

पागा कलगी-16 //19//कन्हैया साहू "अमित" *

आंसू बन अमावत हच भाई आंखी म।
सावन के झङी झरय सुरता राखी म।।...
नान्हेंपन बङ होयेन झगरा,
बिटोवन भारी देखा के नखरा।
घेरी बेरी रिस, हांसे फेर निक,
रोवत हांसत खेलेन संघरा।।
मया पलपलाय जबर तभो छाती म।१
सावन के झङी झरय सुरता राखी म।।...
सुख पीरा जुरमिल के बांटेन,
एक दुसर बर लबारी मारेन।
बिपत म संगी,बखत म ठेनी,
लइकापन म पदोना डारेन।
सुररत रथंव सुरता दिन राती म।२
आंसू बन अमावत हच भाई आंखी म।।...
सीमा म डंटे तैं बन के सिपाही,
देस सेवा तोर जिनगी सिराही।
तिहार बहार सुरता अपार,
घर आये के कब संदेसा आही।।
अगोरा म निहारत रथंव मुहांटी ल।३
सावन के झङी झरय सुरता राखी म।।...
चिट्ठी पतरी सोर न संदेस,
बङ दुरिहा भाई गे परदेस।
बांध लेबे तैं मया डोरी कलई,
भेजे हंव असीस दुवा बिसेस।।
जोरे पठोएव परेवना पांव पांखी म।४
आंसू बन अमावत हच भाई आंखी म।।..
सावन के झङी झरय सुरता राखी म।।....
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*कन्हैया साहू "अमित" *
शिक्षक~भाटापारा
जिला~बलौदाबाजार छ.ग.
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